पारिवारिक कानून
भारत में बच्चे की अभिरक्षा का निर्णय बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि मानकर किया जाता है। यह क्या है: यह निर्धारण कि बच्चा किसके साथ रहेगा (अभिरक्षा) और प्रमुख निर्णय कौन लेगा (संरक्षकता), जो एकमात्र, संयुक्त या निर्धारित मुलाक़ात के साथ हो सकती है। यह कब लागू होता है: तलाक, अलगाव के दौरान या बाद में, या जब माता-पिता या रिश्तेदारों के बीच संरक्षकता विवादित हो। अभिरक्षा व्यक्तिगत कानूनों और संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम द्वारा नियंत्रित होती है, जहाँ न्यायालय किसी भी माता-पिता के दावे से ऊपर बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देते हैं। अधिवक्ता कैसे मदद करता है: अधिवक्ता बच्चे के कल्याण, माता-पिता की क्षमता, शिक्षा और स्थिरता पर साक्ष्य प्रस्तुत करता है; पालन-पोषण की व्यवस्था पर बातचीत करता है; और परिवार न्यायालय या संरक्षकता कार्यवाही में आपका प्रतिनिधित्व करता है। अधिवक्ता मुख्य मामला तय होने तक अंतरिम अभिरक्षा एवं मुलाक़ात के आदेश भी मांग सकता है। पहले कदम: बच्चे के पालन-पोषण में अपनी भागीदारी, वित्तीय क्षमता, रहने की व्यवस्था और दूसरे माता-पिता से संबंधित किसी भी चिंता का दस्तावेज़ीकरण करें। यह समझने के लिए परामर्श बुक करें कि न्यायालय कल्याण का आकलन कैसे करते हैं।